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रविवार, 9 अप्रैल 2023

सऊदी अरब के पास इतना पैसा है, आधुनिक सेना है फिर भी इज़राइल से क्यों डरता है?

साल 1938 की तेल की खोज ने सऊदी अरब की किस्मत पलट दी उसी तेल की वजह से अमेरिका का साथ उसी तेल की वजह से अमीरी। पैसा इतना कि मुकेश अंबानी के पास जितनी दौलत है वहाँ की एक तेल कंपनी saudi aramko एक साल में उससे दो गुना प्रॉफिट दे देती है।

लेकिन लेकिन फिर वो पुरानी हिंदी फिल्मों का सीन याद आता है जिसमे सेठ के घर डाकू आते हैं और वो थर थर काँपने लगता है। सेठ के पास पैसा बहुत है और डाकुओं के पास हथियारों से लड़ने का एक लंबा अनुभव।

हथियार तो सऊदी अरब के पास बहुत है, अमेरिका के दिये हुए और अमेरिका उसे ट्रेनिंग भी देता है। लेकिन लड़ने का असली अनुभव तो तभी होता है जब कोई देश लंबे समय तक या तो खुद लड़ाई करता रहा हो या उसे दूसरों की लड़ाई में अपने लठैत भेजने की आदत हो, अमेरिका की तरह।घर पे बाज और चीते पालने से ये नहीं होता है।

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फिर सऊदी अरब की राजशाही को मजबूत सेना से भी डर लगता है कि कहीं coup ना कर दे।क्योंकि अब लोग ये तो मानते नहीं की राजाओं के दैवीय अधिकार होते है। मौका मिलते ही कांड हो जाएगा।

अब कहने को तो सऊदी रॉयल एयर फोर्स के पास यूरोटाइफून 

 जैसे अत्याधुनिक फाइटर-प्लेन भी है। बोइंग F-15 ईगल्स भी है। दुनिया भर में हवाई लड़ाई के दौरान एफ-15 के नाम 104 अन्य लड़ाकू विमानों को मार गिराने का रिकॉर्ड है लेकिन इस दौरान यह विमान खुद एक बार फिर भी नहीं मारा गया। लेकिन उसका करें क्या? आपके घर मे 5000 किताबें हैं , पढ़ेगा कौन? लेकिन जब आपसे कोई सवाल पूछता है आप किताबों के पन्ने पलटने लगते हैं।

अमेरिका भी नहीं चाहता कि सऊदी अरब सैन्य रूप से मजबूत हो। अगर हो गया तो अमेरिका को भाव कौन देगा।

इसके अलावा बुनियादी खामियाँ भी हैंं। आपने कभी सुना है कि सऊदी अरब का कभी नाम आया हो साइंस एवं टेक्नोलॉजी के बारे में? एक मजबूत देश की पहचान होती है उसकी विज्ञान और तकनीकी में पकड़। इस मामले में सऊदी अरब अभी बहुत पीछे है।

अब करते है इज़राइल की बात। उसके पास खुद की हथियारों की इंडस्ट्री है। उसे इसके लिए दूसरों पर ज्यादा निर्भर नहीं करना पड़ता। सभी नागरिकों के लिए मिलिट्री ट्रेनिंग अनिवार्य है। सबको दो से तीन साल की मिलिट्री ट्रेनिंग दी जाती है। उनके पास खुद का एन्टी बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम, दुनिया के चौथी सबसे बड़ी वायु सेना और आधुनिक हथियारों का बड़ा जखीरा है।

साथ ही साथ उनके पास दुनिया की सबसे बेहतरीन गुप्तचर विभाग है, जिन्होनें काफी सारे विश्व प्रसिद्ध मिशनों को दूसरे देशों में घुस कर काफी सफ़ाई के साथ अंजाम दिया है। 

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सबसे बड़ी बात उसको युद्ध का बहुत लंबा अनुभव है।इज़राइल देश की पैदा होने से लेकर(इज़रायल साल 1948 को वजूद में आया) अबतक वह conflict situation में ही रहा है इसके चारो तरफ दुश्मन ही दुश्मन है।अरब देशों की दुश्मनी ने उसको मजबूत बनाया है। साल 1967 में अरब इज़राइल युद्ध जो केवल 6 दिन चला ने इतिहास बदल के रख दिया।

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इस युद्ध मे इज़रायल मिश्र को गाजा पट्टी से पीछे धकेल देता है।गोलन पहाड़ियों से सीरिया को और जॉर्डन को वेस्टर्न बैंक से पीछे धकेल देता है। अभी भी वह फलस्तीनियों के साथ संघर्ष की स्थिति में है।तो संघर्ष का ये अनुभव उसे एक edge देता है।

फुटनोट

खट्टे मीठे किस्से और अनुभव

Ojas Vyas लिखते हैं :

लूना एक बहुत बड़ा सबक देती थी.. जीवन मे बी-प्लान लेके सेफ खेलने का.. सेफ खेलने के चक्कर मे कई लोगों की जिंदगी लूना बन के रह गयी.. उनमें कैलिबर था साढ़े पाँच सौ सीसी की बुलेट का, लेकिन कभी बहन की शादी, कभी बाप का नजदीक आता रिटायरमेंट, कभी छोटे भाई की पढ़ाई, कभी रेहन पे रखी जमीन तो कभी माँ का ईलाज.. इन लोगों का गाहे-बगाहे तेल खत्म होता रहा.. घर की जिम्मेदारियों को इन्होंने लूना बन के अपने ऊपर लाद लिया.. जीवन की जद्दोजहद में कभी तेल होता तो बीवी को उसके बर्थडे पे रेस्टोरेंट ले गए, कभी तेल खत्म हुआ तो छेद वाली बनियान बदलने के लिए मुहूर्त निकलने लगा.. पर ये लूना टाइप के लोग पूरे आत्मविश्वास के साथ चलते रहे.. कभी घर का छोटा बुलेट निकल गया और लूना की रफ्तार और आवाज पे उलाहना दे गया.. पर लूना टाइप के लोग सदैव सुनते रहे.. मुस्कुराते रहे.. चलते रहे.. बीच राह में स्वाभिमान की टंकी को बिना झुकाए अपने पौरुष का पैडल मारते रहे..

हर घर मे कोई लूना होता है.. उसकी इज्जत कीजिये.. वो आपके घर की वो मजबूत ईंट है जिसकी बुनियाद पे आपका घर टिका है..

(जिनको जानकारी न हो, लूना petrol पर भी चलती है और तेल न हो तो paddle से भी चला सकते हैं)

रविवार, 2 अप्रैल 2023

कई सारे उद्योगपति और अमीर लोग गंजे रहना क्यों पसंद करते हैं?

अब अमीर बनने के लिए होना पड़ेगा गंजा, रिसर्च में हुआ खुलासा

कहा जाता है कि अगर आदमी गंजा है तो इसका मतलब है कि उसके पास खूब पैसा है और वो बहुत अमीर है।

वहीं अगर किसी लड़के के बाल झड़ रहे हों तो समझा जाता है कि वो बहुत जल्‍द अमीर होने वाला है लेकिन क्‍या ये वाकई में सच है। अकसर सुनने में आता है कि जिन लड़कों के बाल नहीं होते या झड़ रहे होते हैं वो अमीर होते हैं । कई बार लोगों को गंजा ही देखा गया है।

तो चलिए अब जानते हैं कि गंजा होने की ये बात कहां तक सच है।

कुछ समय पहले इस तथ्‍य को लेकर रिसर्च हुई थी जिसे पेन्सिलवेनिया यूनिवर्सिटी द्वारा करवाया गया था।

इस रिसर्च की मानें तो पूरी तरह से गंजे लोग ज्‍यादा रौबदार होते हैं और जिन लोगों के बाल खुद ही झड़ने लगत हैं वो अपने बालों को कटवाकर अपनी पर्सनैलिटी को बेहतर बना सकते हैं।

रिसर्च के दौरान गंजे लोगों को सांस्‍कृतिक सोच वाला माना गया है और रौबदार भी। जो गंजे होते हैं वो लंबे और बुलंद आवाज़ वाले भी होते हैं और उनकी बातें बहुत सटीक होती हैं। गंजे लोग अपने आप में बहुत समृद्ध होते हैं और उनका व्‍यक्‍तित्‍व किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। रिसर्च में यह बात भी सामने आई है कि जिनके बाद खुद ही झड़ जाते हैं उन्‍हें तो सिर मुंडवाने की जरूरत है, वो गंजे होकर स्‍मार्ट लग सकते हैं।

तो अब अगर आपको गंजापन मुसीबत लगता था तो समझ जाइए कि ये आपकी अमीरी की निशानी है और अगर आपको अमीर रहना है तो अपने बालों का त्‍याग तो करना ही पड़ेगा। इसके अलावा अगर आप गंजेपन से दूर रहना चाहते हैं और आपको अपने बालों से बहुत प्‍यार है और इन्‍हें बचाने के लिए चिंता में रहते हैं तो आप कुछ घरेलू नुस्‍खे आज़मा सकते हैं।

गंजेपन की वजह

– अधिक मानसिक तनाव

– खानपान की गलत आदतें

– शरीर में प्रोटीन की कमी होना

– बालों की सही तरह से देखभाल ना करना

– किसी हेयर ब्‍यूटी प्रॉडक्‍ट का साइड इफेक्‍ट

दोस्‍तों, कई बार हार्मोनल कारणों या प्रदूषण की वजह से बाल झड़ने लगते हैं और गंजा हो जाता है। अगर आप इस समस्‍या से बचना चाहते हैं तो इन नुस्‍खों का इस्‍तेमाल कर सकते हैं :

  • एक प्‍याज लें और उसे पीस लें। नहाने से पहले पंद्रह मिनट तक इस रस को अपने बालों में लगाएं और इसके सूखने पर बालों को अच्‍छी तरह से पानी से धो लें। रोज़ाना इस उपाय को करने से आपके बालों का झड़ना बंद हो जाएगा।
  • इसके अलावा कच्‍चे पपीते के पेस्‍ट से भी आप बालों को नैचुरल तरीके से काला कर सकते हैं। हफ्ते में दो से तीन बार पपीते को पीसकर बालों में लगाएं। दस से पंद्रह मिनट के बाद बालों को पानी से धो लें। इस नुस्‍खे से गंजापन दूर होने लगेगा और बालों की जड़ें मजबूत होंगीं।
  • केमिकल युक्‍त हेयर प्रॉडक्‍ट यूज़ करने से बेहतर है कि आप इन प्राकृतिक नुस्‍खों से अपने बालों को झड़ने से बचाएं। ये नुस्‍खें ना केवल बालों को मजबूती देंगें बल्कि बालों को पोषण भी देंगें।

रिसर्च की मानें तो गंजापन अमीरी की निशानी है लेकिन अगर आपको ये पसंद नहीं है तो आप इन नुस्‍खों से गंजेपन को दूर कर सकते हैं।

मूल स्रोत गंजा - अब अमीर बनने के लिए होना पड़ेगा गंजा, रिसर्च में हुआ खुलासा

तस्वीरें स्रोत Google

लोग जब टॉयलेट के बारे में पूछते हैं तो उसे टॉयलेट न कहकर बाथरूम कहना क्यों पसंद करते हैं?

टायलेट को बाथरूम कहने का भाव समझने के लिए हमे थोड़ा पीछे जाना चाहिए, उस समय में जब घर-घर में शौचालय नहीं पाए जाते थे और विशेष परिस्थितियों में यदि पाए भी जाते थे तो उनका निर्माण मुख्य भवन ने कुछ दूरी पर एक तरफ किया जाता था जो की अपवाद स्वरूप पाया जाता था।अपने निवास स्थान के मुख्य भवन में शौचालय का निर्माण और उसमे शौच के लिए जाना गर्हित व दोष का कारक माना जाता था। ऐसी स्थिति में लोगों को शौच के लिए खुले में जाना होता था और इस कारण स्त्री वर्ग को विशेष परेशानी उठानी पड़ती थी कारण ये कि उन्हें इसके लिए अंधेरा होने की प्रतीक्षा करनी होती थी। जहां तक सवाल दीर्घशंका का था वहां तक तो ठीक था,लेकिन ऐसी स्थिति में लघुशंका अनुभव होने पर स्त्री वर्ग द्वारा विकल्प के रूप में घर के आंगन का प्रयोग किया जाता था।

ये वो समय था जब ज्यादातर घर मिट्टी के हुआ करते थे और घरों में बड़े बड़े आंगन होते थे और आंगन के जिस हिस्से में हैंडपंप लगा होता था वहां थोड़ी सी जगह घेर दी जाती थी जिसकी आड़ में स्त्रियां स्नान किया करती थी।

घरों में विशेष रूप से स्नान करने के लिए कोई स्थान नहीं बनता था। आगे चलकर जब नगरीय व्यवस्था का प्रसार होने लगा और पक्के घरों का व्यापक स्तर पर निर्माण होने लगा तब धीरे धीरे बाथरूम बनने प्रारंभ हुए और इसका एक कारण जमीन का पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध न होना और निर्माण सामग्री का मंहगा होना भी था,क्योंकि पुराने समय में जितनी जगह में एक आंगन का निर्माण होता था,आगे चल के उस से भी कम जगह में पूरे घर ही बनने लगे।

इस कारण घरों में अपेक्षाकृत एक तरफ एक छोटा था स्थान बाथरूम के नाम पर बनवा दिया जाता था। लेकिन शौचालय अब भी मुख्य भवन में नहीं निर्मित किए जाते थे। उनमें इतनी दूरी होती थी की वो मुख्य भवन से अलग लगे। ऐसी स्थिति में जिस काम के लिए आंगन के घेरे का उपयोग किया जाता था उसकी जगह बाथरूम का इस्तेमाल किया जाने लगा जो आगे चल कर रूढ़ हो गया और लघुशंका का अनुभव होने पर बाथरूम किधर है पूछा जाने लगा। वर्तमान समय में तो और भी प्रगति हो गई है,क्योंकि इन दिनों तो शयन कक्ष से अटैच्ड टॉयलेट बाथरूम बनाए जा रहे। खैर ये विभिन्न कारणों में से एक कारण हुआ। इसके अतिरिक्त अन्य बहुत से ऐसे कारण हैं,जिनके कारण जन सामान्य में ऐसी प्रवृत्ति देखी जाती है कि टॉयलेट को बाथरूम कह दिया जाता है।

भारतीय जनमानस में एक भाव व्याप्त है और वो भाव है, कि अंग्रेजी भाषा हिंदी भाषा से श्रेष्ठ है और अंग्रेजी भाषा बोलना हिंदी भाषा बोलने से अधिक सभ्य माना जाता है । कुछ लोग तो ऐसे भी दिखे जो अंग्रेजी बोलने में श्रेष्ठता का अनुभव करते है और हिंदी बोलने में उन्हें हीनता का बोध होता है।

हालांकि अंग्रेजी हिंदी से श्रेष्ठ व कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण है भी,लेकिन इसलिए नहीं कि उसे अंग्रेज बोलते हैं और अंग्रेज बहुत गोरे होते हैं इतने गोरे की हिंदी बोलने वाले गोरे भारतीय उनके आगे खुद को काले महसूस करने लगते हैं,अब चूंकि चमड़ी का रंग तो ईश्वर की देन है जो मिल गई मिल गई, उसे नहीं बदल सकते, लेकिन भाषा तो बदली जा ही सकती है,सो बदल लेते हैं।

लेकिन क्या यही बात है अंग्रेजी के श्रेष्ठ होने के पीछे? कतई नहीं इसकी श्रेष्ठता इसके बोलने वालो की चमड़ी के रंग से नहीं है,बल्कि उनके पुरुषार्थ से है जिसके दम से वो नई नई व उपयोगी सामग्री की खोज कर अपनी अंग्रेजी भाषा को समृद्ध करते हैं, ताकि उसका लाभ उठाने के लिए पूरी दुनिया उनकी भाषा सीखने को बाध्य हो। इन दिनों, विज्ञान, तकनीक, चिकित्सा, संचार, शिक्षा, अंतरिक्ष विज्ञान आदि सभी महत्वपूर्ण क्षेत्रों में यदि सबसे अधिक शोध कार्य या नवाचार हो रहे वो अंग्रेजी भाषा में ही हो रहे। ये कार्य हिंदी बोलने वाले भी करते तो दुनिया हिंदी भी सीखती,लेकिन जिससे ऐसा करने की उम्मीद की जाए अगर उसे ही इससे हीनता बोध का अनुभव हो,तब इस विषय में सोचना भी व्यर्थ है।

ये मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि वो स्वयं को विशेष मानता है,और इसके लिए वो कोई कारण भी ढूंढ लेता है और अपने आस पास के लोगों से ऐसी आशा भी रखता है की उसके कारणभूत गुण का संज्ञान लेते हुए लोग उसे विशेष मानें भी। इस क्रम में वो बहुधा जो कारण ढूंढता है वो प्रायः निषेधात्मक होता है यानी वो कुछ करने को नहीं बल्कि कुछ न करने को अपनी विशेषता बनाता है क्योंकि कुछ न करना कुछ करने की अपेक्षा अधिक सरल होता है,क्योंकि कुछ न करने के लिए कुछ करना नहीं होता है। जैसे "मैं चाय नहीं पीता", "मैं लहसुन प्याज नहीं खाता", "मैं इलायची भी नहीं खाता", "मैं फिल्म नहीं देखता"। जो नहीं करना चाहिए वो मैं नहीं करता हूं,और जो करना चाहिए मैं वो भी नहीं करता हूं और इसलिए मैं विशेष हूं। लोगों को ये बात माननी भी चाहिए।

इस प्रवृत्ति की पराकाष्ठा तब देखी जब एक गांव में ही पैदा हुए, पले बढ़े, आदमी ने कुछ एक साल मुंबई में बिताने के बाद घर लौटने और मुझसे मुलाकात होने पर जब मुझसे ये कहा की उसे भोजपुरी बोलना भूल गया, मैने पूछा की क्यों क्या तुमने मराठी सीख ली इस कारण? तो बोला नहीं "मैं जिधर काम करता हैं न उधर जो बंबइया हिंदी बोली जाती है उसी की आदत लग गई है" ये सुनकर मैं अवाक हो कर ये सोचने लगा की ये कह क्या रहा कि यहां इसने 19 साल तक की जो उम्र गुजारी और उसमे जो कुछ भी सीखा और उसमे भी जो सबसे पहली चीज सीखी यानी उसकी पारिवारिक भाषा या बोली भोजपुरी वो बस 1 साल मुंबई में गुजारने के बाद इसे भूल गई? पैदाइश से लेकर 19 की उम्र तक गांव में गुजारे गए सालों पर वो मुंबई वाला 1साल भारी पड़ गया ऐसा कैसे हो सकता है?

उत्तर भारत के उन क्षेत्रों जिन्हे की हिंदी भाषी क्षेत्र माना जाता है, के लोगों में ये लक्षण बड़ी आसानी से देखा जा सकता है। और इसके बीज इतिहास में ही पड़े हुए हैं अंग्रेज लोगो ने हमारे अंदर अपनी भाषा संस्कृति के प्रति जो हीनता बोध का अनुभव करवाया वो आज भी वैसा का वैसा बना हुआ है। जिनका अंग्रेजी बोलना असंभव है वो भोजपुरी को दरकिनार करते हुए उसे बोलना भूल जाते हैं और भद्दी हिंदी बोलते हुए स्वयं को प्रगतिशील मान लेते हैं,जैसे -

"क्या भया है?" "मेरे गोड़ में घाव लग गया है" " मेरा कपार पिरा रहा है" "गेना इधर बीगो" "बार झार के स्कूल आया करो"

जो थोड़ी बहुत अंग्रेजी समझते हैं लेकिन बोलने की कुव्वत नहीं रखते वो हिंदी भूलने लगते हैं और जितना हो सके उतना हिंदी में अंग्रेजी के शब्द मिला के बोलते हुए स्वयं को प्रगतिशील मान लेते हैं, जैसे -

अरे यार मेरी बात का बिलीव नहीं मानोगे।

एक्चुअली मैं स्टेशन में रीच कर रहा था की उनका फोन अराइव हुआ।

मैं मार्केट गया चिकेन लाया और जिंजर गार्लिक पेस्ट में फेट कर हाफ ओ क्लाक के लिए मैगनेट(मेरिनेट) होने को रख दिया।

एक और श्रेणी है जो अंग्रेजी बोल लेती है, लेकिन अप्रासंगिक और अव्यवहारिक तरीके से वहां भी अंग्रेजी बोलने लगती है जहां पर ऐसी आवश्यकता भी नहीं होती जैसे - यहां कोरा पर भी ऐसे लोग बहुत मिले, जिनमें कॉमन सेंस का इतना अभाव होता है की वो ये भूल जाते हैं कि हम जहां पर अपनी बात अंग्रेजी में कह रहे वो सार्वजनिक व सामाजिक मंच विशेष रूप से हिंदी भाषा को समर्पित है। कभी कभी तो हिंदी में हो रही बातचीत के बीच में ही व्यक्ति अचानक से अंग्रेजी बोलने पर उतर आता है, मानो थोड़ी देर पहले उस व्यक्ति के अंदर रहने वाली जयशंकर प्रसाद की आत्मा को जबरदस्ती बाहर निकाल विलियम वर्ड्सवर्थ की आत्मा घुस गई हो।

उदाहरण स्वरूप एक दिन ऐसे ही किसी प्रसंग में एक प्रगतिशील महिला को जिनसे मेरी हिंदी में बात हो रही थी,अचानक से अंग्रेजी का दौरा आ गया और वो थोड़ी देर पहले बोली जा रही हिंदी की जगह अंग्रेजी बोलने लगीं ऐसा इसलिए की हिंदी में हो रही बातों में मेरी बातें उन पर भारी पड़ रही थी तो उन्होंने मुझे अंग्रेजी बोल कर दबाना चाहा। उन्हें ऐसा करते देख मुझे अनुभव हुआ की शायद ये हिंदी की जगह अंग्रेजी बोलकर मेरी बोलती बंद करना चाहती हैं, क्योंकि इन्हें मेरा हिंदी में बात करना ऐसा लग रहा मानों मैं अंग्रेजी जानता ही नहीं। फिर बाध्य होकर मुझे उनका ये भ्रम दूर करना पड़ा।

इससे भी बड़े आश्चर्य की बात ये है की ऐसे अंग्रेजी के विद्वान कोरा के अंग्रेजी संस्करण में किसी प्रश्न को पूछना या किसी प्रश्न का उत्तर देना तो दूर अपनी प्रोफाइल तक पूरी नहीं किए होते हैं, लेकिन कोरा के हिंदी संस्करण में इनकी ये प्रवृत्ति अप्रासंगिक माध्यम से प्रकट हो जाती है, जहां पर उसका कोई औचित्य नहीं होता।

भाषा के प्रति ऐसे हीनताबोध का एक और उदाहरण साझा करना चाहूंगा। कुछ साल हुई मेरे पड़ोस में एक परिवार रहता था। जिसमे दो बच्चे थे और वो अंग्रेजी माध्यम के एक विद्यालय में पढ़ रहे थे। चूंकि उनके दादा दादी इतने पढ़े लिखे नहीं थे कि उन्हें पढ़ा लिखा कहा जा सके, इसलिए अपने बच्चो की शिक्षा दीक्षा में वो कोई कमी नहीं होने देना चाहते थे। परिवार के सभी सदस्यों का बच्चो की पढ़ाई लिखाई के प्रति विशेष आग्रह था। घर में एक अघोषित नियम था जिसका कड़ाई से पालन होता था और वो नियम ये था की परिवार का कोई भी व्यक्ति बच्चो से भोजपुरी में बात नहीं करता था, लेकिन आपस में पूरे परिवार के सदस्य भोजपुरी में ही बात करते थे। और ये बच्चों के स्वविवेक पर छोड़ दिया गया था कि वो परिवार के अन्य सदस्यों के बीच भोजपुरी में हो रही बातचीत पर कोई ध्यान न दें। अब इसका परिणाम ये हुआ की उन दोनों बच्चो में जिस भाषा का विकास हुआ उसे न तो खड़ी बोली हिंदी ही कहा जा सकता था नहीं भोजपुरी ही।

ऐसे तो कश्मीर से कन्याकुमारी तक पाए जाने वाले भारतीय लोगों का अंग्रेजी के प्रति विशेष रुझान देखा जा सकता है, लेकिन इसके साथ ही साथ ये भी देखा जाता है की बहुत से भारतीय राज्यों की अपनी अपनी भाषाएं हैं, और वहां एक बड़ा वर्ग अंग्रेजी बोलना भी जानता है और उत्तर भारतीय लोगों से कहीं बेहतर, लेकिन यदि उन्हें स्वभाषाभाषी से बात करनी होती है तो वो अपनी मातृभाषा में ही बात करने को तरजीह देता है, और अंग्रेजी का प्रयोग उन्ही लोगो के साथ करता है जो उसकी अपनी भाषा में बात नहीं कर सकता।

इनमे और हिंदी भाषियों में जो मूल अंतर है वो इस बात का है की हिंदी बोलने वाले को अपनी मातृभाषा बोलने में शर्म आती है। दो भोजपुरी बोल सकने वाले, शुद्ध भोजपुरी बोलने से बेहतर अशुद्ध खड़ी बोली हिंदी बोलने को मानते हैं, दो शुद्ध हिंदी बोल सकने वाले, हिंदी में जितना बन पड़े उतनी अंग्रेजी मिला कर बोलते हैं, ताकि सुनने वालों को लगे की ये भारतीय मूल के विदेशी हैं और पैदाइश से लंदन में रहे हैं, चूंकि परिवार भारतीय है इसलिए ऐसे परिवार से होने के कारण अंग्रेजी की बैसाखी लेकर टूटी फूटी और लंगड़ाती हुई हिंदी बोल लेते हैं। जो अंग्रेजी बोल लेते हैं वो तो कुत्ते बिल्लियों से भी उसी में बात करते है, और अगर एक विशेष प्रकार का तरल यदि उन्हें मिल गया तो वो जहां होते हैं वहीं पर लंदन, 10 डाउनिंग स्ट्रीट, और बकिंघम पैलेस भी उतार देंते हैं।

हिंदी में अंग्रेजी मिला कर बोलने की आदत सबसे ज्यादा महिलाओं और लड़कियों में दिखती है, जैसे पति को हसबैंड या हबी बोलना, फियांसएक्चुअलीडिफेनेटिलीडॉगीकॉउशिटआउचऑफकोर्सबुलशिट इत्यादि। एक फौज और खड़ी हो रही जो अभी 10-12 में पढ़ रही, अंग्रेजी भले न आए, लेकिन उसके कोटेशन कॉपी कर के फेसबुक पर पेस्ट कर दे रही और जो लिखा है उसकी मीनिंग पूछ दी जाए तो ये सन्नाटे में आ जाते हैं।

कुछ लोग तो बिलकुल क्लाइमैक्स पर पहुंच चुके हैं, जिन्हे टट्टी लगी है कहने में शर्म आती है, और वो कहते है लैट्रीन लगी है, पेशाब लगने पर कहते हैं बाथरूम लगी है। और इन दिनों कुछ तो ऐसे दिख रहे जिन्हे मां, पिता,और बहन या फिर बीबी कहने में भी शर्म आती है और इनकी जगह वो मदर, फादर और सिस्टर और वाइफ कह रहे।

अपनी स्वयं की मातृभाषा के प्रति उत्तर भारतीय लोगों में जो हीनता बोध देखने को मिलता है, वैसा अन्यत्र पाया जाना दुर्लभ है।और ये विशेषता विशेष रूप से हिंदी भाषी क्षेत्र के लोगों में ही दिखती भी है,नहीं तो मैंने दो बांग्ला लोगों को कभी उनकी अपनी मातृभाषा बांग्ला को छोड़ हिंदी अथवा अंग्रेजी में बात करते नहीं देखा, नहीं कभी दो पंजाबियों को ही अपनी मातृभाषा को छोड़ किसी अन्य भाषा में बात करते देखा हां, हिंदी भाषी लोगों को अंग्रेजी में बात करते अवश्य देखा।

यहां अंग्रेजी बोलना श्रेष्ठ होना हुआ और हिंदी बोलना पिछड़े होने का प्रतीक, इस भाव का जन्म कब, कैसे और कहां हुआ मैं ये नहीं कह सकता लेकिन इस भाव को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है हिंदुस्तान में रहने वाला एक हिंदीभाषी हिंदुस्तानी अगर कभी कस्टमर सर्विस में काल करे तो जब भाषा चयन के विकल्प दिए जाते हैं तो वहां भी हिंदी का विकल्प दूसरे नंबर पर आता है और हमे जो मशीन की आवाज सुनाई देती है उसमे भी यही सुनाई देता है,फॉर इंग्लिश प्रेस वन,हिंदी के लिए दो दबाएं

हिंदी की स्थिति जानने समझने के लिए इतना ही काफी है कि हिंदी भाषी जनमानस को भाषा चयन के लिए दिए जाने वाले विकल्प में हिंदी दूसरे स्थान पर होती है, इसे और बेहतर ढंग से समझने के लिए कल्पना की जाए की इंग्लैंड में वहां के नागरिकों को भाषा विकल्प में हिंदी पहले और अंग्रेजी दूसरे विकल्प के तौर पर दी जाए तो ये किस सीमा तक अव्यवहारिक अनुभव होगा?

हो सकता है मेरी इन बातों को सुन कर किसी को ऐसा लगे की मैं अंग्रेजी का विरोधी हूं, तो स्पष्ट करना चाहूंगा की मुझे किसी के अंग्रेजी सीखने पढ़ने या बोलने से कोई विरोध नहीं है, जिसमे ऐसी योग्यता हो वो 1 क्या 36 भाषा सीखे अथवा बोले, पूरा राहुल सांकृत्यायन बन जाए। मुझे इस बात में भी कोई संदेह नहीं है की अंग्रेजी भी एक महान भाषा है और वर्तमान परिदृश्य में इसकी उपयोगिता स्वयं सिद्ध है। एक वैश्विक भाषा के रूप में यह निरंतर और भी महत्वपूर्ण होती जा रही है। इसलिए यहां कही गई मेरी बातों को अंग्रेजी के विरोध में न समझते हुए, इसे हिंदी के समर्थन के रूप में देखा जाना चाहिए।

कभी कभी सोचता हूं की कोई विदेशी व्यक्ति जिसकी मातृभाषा अंग्रेजी हो वो दो हिंदीभाषियों को आपस में अंग्रेजी में बात करता देख कर क्या सोचता होगा? अपनी मातृभाषा के प्रति समर्पण प्रत्येक हिंदीभाषी का कर्तव्य होना चाहिए,क्योंकि किसी अन्य भाषा के आगे अपनी मातृभाषा को हेय समझने वाला व्यक्ति जीवन में कभी सफल नहीं हो सकता, जिसका अपनी मातृभाषा पर ही अधिकार न हो वो कोई अन्य दूसरी भाषा सीख पाएगा ये मेरी दृष्टि में असंभव है। ऐसी स्थिति में किसी भाषा का क्या भविष्य होगा ये उसके बोलने वालो पर ही निर्भर lकरेगा और भारत जैसे किसी ऐसे राष्ट्र में, जहां पर राज्यों का विभाजन ही भाषाई आधार पर हुआ हो, हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने की क्या आशा की जाए जबकि इसे बोलने वाले ही इसे हाशिए पर डाले हुए हों और इसका प्रयोग उन्हें हीनता बोध करवाता हो।

प्रख्यात साहित्यकार सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय ने इस संदर्भ में कहा है कि -

“किसी भी समाज को अनिवार्यतः अपनी भाषा में ही जीना होगा। नहीं तो उसकी अस्मिता कुण्ठित होगी ही होगी और उसमें आत्म-बहिष्कार के विचार प्रकट होंगे।”

अतः अपनी भाषा को उपेक्षित करना अपनी संस्कृति व सभ्यता को उपेक्षित करने जैसा ही माना जाना चाहिए, और किसी अन्य भाषा के प्रभाव में अपनी भाषा को नकारने वाला व्यक्ति कहीं भी सम्मान का पात्र नहीं हो सकता। इसलिए हम चाहे जितनी भी भाषाएं सीखे हमें अपनी मातृभाषा की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए और उसे भी साथ लिए चलना चाहिए, क्योंकि यदि हम ही उसे।छोड़ देंगे तो उसका मृत होना अवश्यंभावी है, और भाषा का मृत होना, संस्कृति के मृत होने जैसा ही है।

कुछ ऐसे ही भाव भारतेंदु हरिश्चंद्र की इन पंक्तियों से भी प्रकट होते हैं।

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिनु निज भाषा ज्ञान के, मिटे न हिय को सूल॥

क्या वास्तव में प्रकृति से बड़ा कोई शिक्षक नहीं है?

पक्षियों का राजा बाज को कहा जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस बाज़ की ज़िंदगी का हर पल कितना मुश्किल होता है?

एक बाज़ का जीवन एक कठिन प्रशिक्षण से शुरू होता है, एक ऐसा प्रशिक्षण जो इसे अन्य पक्षियों पर हावी होने की शक्ति देता है, एक प्रशिक्षण जो इसे बादलों के ऊपर, बादलों के ऊपर उड़ने के लिए प्रेरित करता है।

और यह कठिन प्रशिक्षण उसके जीवन की शुरुआत में, उसे जीवन में अगले उतार-चढ़ाव का सामना करने में मदद करता है।

आमतौर पर, पक्षी अपने बच्चों की ओर तब तक ध्यान देते हैं जब तक कि युवा पक्षी ठीक से उड़ना नहीं सीख लेता, लेकिन बाज़ के मामले में यह बिल्कुल विपरीत है। जब बाज़ अंडे से पैदा होता है, उसके तुरंत बाद उसका प्रशिक्षण शुरू हो जाता है।

अन्य पक्षियों की तरह ये भी बाहर से खाना इकट्ठा करते हैं और सीधे बच्चे के मुंह में डाल देते हैं। लेकिन बाज़ के मामले में यह बहुत अलग है, बाज़ के माता-पिता भोजन इकट्ठा करते हैं, लेकिन भोजन को सीधे शावकों के मुँह में नहीं डालते हैं, लेकिन पहले बच्चों को यह बता दें कि यह भोजन है।

फिर भोजन को बच्चे से दूर रखा जाता है। जब बच्चा भूख से बेचैन होता है तो वह खाने की तरफ जाने की कोशिश करता है, लेकिन असफल हो जाता है, क्योंकि उसके पैर अभी तक ठीक नहीं हुए हैं, लेकिन भूख बड़ी है, उसे वैसे भी खाना चाहिए।

तो बड़ी मुश्किल से, बार-बार के प्रयास से बच्चे को भोजन तक पहुंचना पड़ता है। लेकिन पीड़ा यहीं खत्म नहीं होती, यहां तक ​​कि भोजन के पास पहुंचने पर भी वह भोजन उठाकर खाना नहीं जानता। इस तरह वह चलना सीखता है।

इसके बाद उनके जीवन का एक और कठिन दौर शुरू हुआ। क्योंकि इस बार उनकी ट्रेनिंग उड़ना सीखने की ट्रेनिंग होगी. बाज़ की माँ बच्चे को अपनी चोंच या पैर में ऊपर आसमान में उठाती है, फिर अचानक उसे उस ऊँचाई से छोड़ देती है।

छोटा बाज़ बचने के लिए अपने पंख फड़फड़ाता है, लेकिन वह उड़ने में सफल नहीं होता। जमीन पर गिरने से पहले मां-बाज़ अपने बच्चे को फिर से पकड़ लेती है।

इसमें छोटे लड़के का ऊंचाई से डरना और उड़ना सीखना साथ-साथ चलता है। कई बार बाज़ की माँ भोजन पकड़ने के लिए घोंसले के बाहर उड़ जाती है, भूखा बाज़ जब भी भोजन के लिए बाहर निकलता है तो नीचे की ओर गिर जाता है

और अपने आप को बचाने के लिए पंख फड़फड़ाता है, इस प्रशिक्षण के दौरान यह बहुत घायल हो जाता है। लेकिन माँ-बज़ जो उसे नहीं छोड़ेगी!

इस तरह एक दिन वह उड़ना सीख जाता है, उसे ऊंचाई से डर नहीं लगता। व्यक्ति का लक्ष्य वस्तु पर स्थिर रहता है। और बचपन से ही इस कठिन प्रशिक्षण के कारण बाज बड़े जानवरों पर हमला करने की हिम्मत जुटा लेता है।

जैसे-जैसे जीवन का पहिया घूमता है, जब शरीर के पंखे हवा के प्रवाह को ठीक से आगे नहीं बढ़ा पाते हैं, जब होंठ पहले की तरह तेज नहीं रह जाते हैं, जब पैर के नाखून बढ़ जाते हैं, जब भोजन उन्हें आसानी से समझ में नहीं आता है, तब एक नया शुरुआत शुरू होती है। संघर्ष लेकिन तब बाज़ केवल 40 वर्ष का था, दूसरी ओर उसका जीवन काल 70 वर्ष था। इस समय, उसे एक चरम निर्णय लेना होता है कि वह कुछ समय के लिए पीड़ित होगा या समय से पहले मर जाएगा! इस समय उसके सामने तीन रास्ते खुल जाते हैं-

वह आत्महत्या कर लेगा, या गिद्धों जैसे मरे हुए जानवरों को खा जाएगा, या अपने आप को एक नया जीवन दे देगा! वह बुद्धिमानी से अंतिम रास्ता चुनता है।

अब वह किसी ऊँचे पहाड़ पर चला जाता है या किसी दुर्गम स्थान पर जाकर शरण लेता है। होठों ने धीरे-धीरे देह के सारे पंख खींचे, दर्द क्या समझे? ये उसके लिए कुछ भी नहीं हैं जिसका जीवन संघर्ष से शुरू होता है।

फिर वह अपने कुंद होंठ को एक चट्टान पर मारता है और उसे तोड़ता है, खून बहता है, लेकिन वह जानता है कि अगर उसे जीवित रहना है तो उसे भुगतना होगा।

लंबे इंतजार के बाद धीरे-धीरे उसके शरीर में नए पंख आते हैं, नए तीखे होंठ निकलते हैं, एक और नया जीवन शुरू होता है। करीब 150 दिन के इंतजार के बाद उनकी नई जिंदगी शुरू हुई। वह शेष 30 वर्षों के लिए फिर से अपने दम पर जीने के लिए तैयार हो जाता है।

इसलिए यदि आपके जीवन में कई संघर्ष हैं, तो यह सोचकर मत बैठिए कि आप दुर्भाग्यशाली हैं।

बल्कि परिस्थितियाँ और संघर्ष आपको और अधिक लचीला होने के लिए प्रशिक्षित कर रहे हैं, बिल्कुल भी न टूटने के लिए, अपने संकल्प को मजबूत रखने के लिए, अपने लक्ष्यों पर टिके रहने के लिए।

बाज कभी झुंड में नहीं रहते। इसलिए जीवन में कुछ करना है तो टीम का भ्रम छोड़कर अपना घर बनाना होगा। क्योंकि जिस दिन आप सफल होंगे, आपका मुस्कुराता हुआ दोस्त भी आपके साथ सेल्फी लेने का इंतजार कर रहा होगा।

धन्यवाद 😊🥰😊

क्रेडिट - अनूप चीचाम 

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ये बाबा हैं अंबानी से भी बड़े बिजनेसमैन

‘ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो, भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी…मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी…।’ ये लाइने शायद आपने पहले भी सुनी होंगी। यानि जवानी या फिर बुढ़ापे में हर कोई अपने बचपन के दिनों को याद करता है। बचपन की कुछ यादें ऐसी होती हैं जिन्हें इसांन फिर से जीना चाहता है। आज हम आपको आपके बचपन से जुड़ी ऐसी ही याद के बारे में एक खबर बताने जा रहे हैं, जो शायद आपको जरुर जाननी चाहिए। आज हम आपको संतरे की गोली वाले ये बाबा से मिलवाने जा रहे हैं। जी हां, वही संतरे वाली गोली जिसे हम बचपन में बड़े ही चाव से खाते थे।

इस पीढ़ी में शायद ही कोई ऐसा बच्चा हो जिसने बचपन में इन खट्टी-मीठी गोली का लुत्फ न लिया हो। वो बच्चे समय के साथ बड़े हो गए। कईयों की शादी हो गई। लेकिन, इस बाबा की संतरे वाली गोलियों का स्वाद बड़े हो चुके बच्चों की जुबां पर आज भी है। आपको हैरानी होगी की इतने सालों से ये बाबा आज भी संतरे की गोलियां बेच रहे हैं। संतरे की गोली वाले बाबा आज भी ये गोलियां बेच रहे हैं और छोटे-बड़े बच्चे इसे खरीद रहे हैं।

हम बात कर रहे हैं ग्वालियर, मप्र के रहने वाले 91 साल के बुजुर्ग मूलचंद्र सोनी परात के बारे में। मूलचंद्र ने सालों पहले संतरे की गोली बनाने का बिजनेस शुरु किया था। शायद आपने भी बचपन में इन गोलियों का स्वाद चखा होगा। लेकिन, इतने सालों बाद भी अब जब समय पूरी तरह से बदल चुका है ये बुजुर्ग आज भी संतरों की गोलियां बेचते हैं। उन्होंने इसे अपना बिजनेस और जीने का जरिया बना लिया है।

आपको याद होगा कि स्कूल के दिनों में ये संतरे की गोलियां हम सभी बड़े चाव से खाते थे। ये बाबा आज भी उन लड़कियों की शादियों में जाते हैं जो कभी इनसे संतरे की गोलियां खरीदती थी। शहर के लोग भी बाबा की उतनी ही इज्जत करते हैं। बाबा के बारे में बताया जाता है कि वो हर उस लड़की की शादी में एक साड़ी लेकर आशीर्वाद देने जाते हैं, जिसने कभी बचपन में उनके यहां से संतरे वाली गोली खरीदी हो। बाबा का बच्चियों के प्रति ऐसा स्नेह है कि वो गोली बेचने से हुई कमाई से एक-एक रुपया जोड़कर इन बच्चियों के लिए साड़ी खरीदते हैं।

बता दें कि बाबा ने शादी नहीं की है। बाबा के लिए यहीं बच्चियां ही उनकी बेटियां हैं। मूलचंद्र सोनी नाम के ये बुजुर्ग मप्र के ग्वालियर स्थित बालाबाई के बाजार में रहते हैं। करीब 91 साल के हो चुके मूलचंद्र संतरे की गोलियां बेचते नजर आ जाते हैं। आपको बता दें कि मूलचंद्र सोनी ने उम्र भर यही काम किया है। मूलचंद्र सोनी ने भले ही बहुत अधिक पैसे न कमाए हो लेकिन उन्होंने स्नेह और प्यार का बिजनेस किया है। मूलचंद्र सोनी ने अपने लिए पैसे नहीं बल्कि इज्जत कमाई है। इसलिए वो अंबानी जैसे बिजनेसमैन से भी बहुत बड़ा बिजनेसमैन हैं।